मंदिर में 40 साल से रोज़ा इफ्तार की सेवा: साझा विरासत की मिसाल बना Sufi Dar

संजीव पॉल
संजीव पॉल

Chennai की गलियों में हर शाम एक अनोखी तैयारी होती है। यह सिर्फ आरती या पूजा की तैयारी नहीं होती, बल्कि रोज़ा खोलने के लिए बन रहे इफ्तार के खाने की भी होती है।

शहर का Sufi Dar Temple पिछले चार दशकों से एक परंपरा निभा रहा है। मंदिर की रसोई में बना खाना हर शाम पास की मस्जिद भेजा जाता है, जहां सैकड़ों लोग रोज़ा खोलते हैं। यह कहानी किसी PR अभियान की नहीं, पड़ोस की है।

40 साल पुरानी पहल, Partition के दर्द से जन्मी

बताया जाता है कि यह परंपरा एक हिंदू शरणार्थी परिवार ने शुरू की थी, जो विभाजन के बाद यहां आ बसा। उन्होंने शायद इतिहास के जख्म देखे थे, इसलिए उन्होंने रसोई को मरहम बना दिया। धीरे-धीरे मंदिर के स्वयंसेवक इस पहल से जुड़े। आज भी खाना धार्मिक पहचान देखकर नहीं, जरूरत देखकर बनता है। यहां धर्म दीवार नहीं, डाइनिंग टेबल बन जाता है।

“नेशनल डिबेट” बनाम “लोकल रिश्ते”

देश में जब-जब धार्मिक ध्रुवीकरण पर बहसें तेज होती हैं, तब-तब ऐसे मोहल्ले चुपचाप अपना काम करते रहते हैं। कोई टीवी डिबेट नहीं। कोई हैशटैग वॉर नहीं। बस शाम का खाना और साथ बैठकर रोज़ा खोलते लोग। कभी-कभी देश की सबसे मजबूत खबरें वो होती हैं, जो चीखती नहीं, बस चलती रहती हैं।

इफ्तार से आगे की बात

मंदिर आयोजकों का कहना है कि यह पहल “साझी संस्कृति” की अभिव्यक्ति है। स्थानीय लोगों के मुताबिक इससे हिंदू और मुस्लिम समुदाय के बीच भरोसा मजबूत हुआ है। यह कोई बड़ी राजनीतिक घोषणा नहीं, बल्कि रोजमर्रा की साधारण इंसानियत है। और शायद असली शक्ति भी वहीं छुपी होती है।

जब देश के अलग-अलग हिस्सों में धर्म की चर्चा अक्सर बहस में बदल जाती है, तब Chennai का यह मंदिर याद दिलाता है कि harmony headline नहीं, habit भी हो सकती है। सवाल यह नहीं कि कौन किसे खिला रहा है। सवाल यह है कि क्या हम साथ बैठ पा रहे हैं?

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